अगर EVM hack करके चुनाव का नतीजा बदला जा सकता था, जैसा विपक्ष के कुछ नेताओं की ओर से लंबे समय तक आरोप लगाया जाता रहा—तो फिर SIR की जरूरत क्यों पड़ती?
अगर वोट मशीन में ही बदलने थे, तो voter list में नाम जोड़ने, हटाने और verification की इतनी बड़ी प्रक्रिया क्यों?
और अगर BJP EVM के जरिए लगातार “Vote Chori” कर रही थी, तो फिर 2014 में BJP ने 282 सीटें, 2019 में 303 सीटें जीतीं, लेकिन 2024 में BJP 240 सीटों पर कैसे आ गई?
यानी सवाल सिर्फ आरोप लगाने का नहीं है—
पूरी कहानी आपस में match भी करनी चाहिए।
ECI के अनुसार उसकी EVM standalone है और internet या किसी external network से connected नहीं होती। लेकिन किसी भी बड़े आरोप को सिर्फ बयान से नहीं, ठोस evidence से साबित करना चाहिए।
और यहीं से हमारी आज की कहानी शुरू होती है—
SIR, Election Commission, Gyanesh Kumar और Indian Express की रिपोर्ट।
पहले Gyanesh Kumar की timeline समझिए
Gyanesh Kumar 19 फरवरी 2025 को Chief Election Commissioner बने।
लेकिन वे Election Commission में फरवरी 2025 में पहली बार नहीं आए थे।
वे 15 मार्च 2024 को Election Commissioner नियुक्त हुए थे।
इसलिए 2014 से होने वाली हर चुनावी हार का जिम्मेदार सीधे Gyanesh Kumar को बताना timeline के हिसाब से सवाल खड़ा करता है।
और जरा 2014 के बाद के चुनावों को देखिए।
BJP ने 2014 में 282 और 2019 में 303 Lok Sabha seats जीतीं।
लेकिन 2024 में BJP की सीटें घटकर 240 रह गईं।
और सिर्फ लोकसभा नहीं—
Karnataka में Congress जीती,
Telangana में Congress सरकार बनी,
Jharkhand में विपक्षी गठबंधन सत्ता में आया,
Punjab में AAP सत्ता में आई,
Tamil Nadu में DMK सत्ता में रही,
Kerala में LDF सत्ता में रही।
West Bengal में 2011 से TMC सत्ता में है।
और Odisha में BJD करीब 24 साल सत्ता में रही, फिर 2024 में BJP ने सरकार बनाई।
तो सवाल है—
अगर पूरी चुनावी व्यवस्था हमेशा एक ही पार्टी के पक्ष में नियंत्रित थी, तो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियाँ चुनाव जीतकर सरकार कैसे बनाती रहीं?
यह किसी आरोप को अपने-आप गलत साबित नहीं करता, लेकिन इतने बड़े आरोप के लिए ठोस सबूत जरूरी है।
अब 1991 का उदाहरण भी समझिए
सोशल मीडिया पर 1991 के चुनाव को लेकर एक तस्वीर भी वायरल है।
इसमें कुछ बातें बिल्कुल सही हैं।
T. N. Seshan दिसंबर 1990 में Chief Election Commissioner बने थे।
1991 का Lok Sabha election 20 मई 1991 से शुरू हुआ।
फिर 21 मई 1991 को Rajiv Gandhi की हत्या हुई।
इसके बाद Election Commission ने चुनाव के दो phases स्थगित किए।
यानी Election Commission ने परिस्थितियों के अनुसार चुनाव प्रक्रिया में फैसला लिया था।
लेकिन यह कहना कि पूरे चुनाव के सारे phases रद्द कर दिए गए थे, सही नहीं है।
इसलिए इतिहास को बताइए जरूर—
लेकिन पूरा इतिहास बताइए।
अब आते हैं आज के SIR विवाद पर
Indian Express की एक investigative report ने Election Commission की internal decision-making को लेकर सवाल उठाए।
रिपोर्ट के मुताबिक Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज कीं।
इनमें Form-6, voter database, SIR process, West Bengal appeals और Goa के 97 voters से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया।
अब सवाल उठना स्वाभाविक है।
लेकिन—
Election Commission का जवाब भी सुनना जरूरी है।
EC ने कहा कि Commissioners के अलग-अलग observations और suggestions किसी भी institution की normal deliberative process का हिस्सा हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—
EC के मुताबिक पिछले एक साल में लिए गए final decisions पूरे Commission के unanimous decisions रहे।
आयोग ने यह भी कहा कि करीब 40 नई initiatives और कई electoral reforms किए गए हैं और कुछ internal notes को अलग करके पूरी तस्वीर नहीं देखी जा सकती।
तो यहाँ दो बातें सामने हैं—
Indian Express की report में internal objections।
और दूसरी तरफ—
Election Commission का unanimous decisions वाला जवाब।
जनता को दोनों पक्ष देखने चाहिए।
लेकिन सवाल इससे भी बड़ा है
आज चुनाव हारिए—
EVM पर सवाल।
चुनाव हारिए—
Election Commission पर सवाल।
“Vote Chori” का आरोप लगाइए।
सेना कोई बड़ा operation करे—
सबूत मांगिए।
Supreme Court फैसला दे—
अदालत पर सवाल।
CBI या ED कार्रवाई करे—
पूरी संस्था पर सवाल।
लेकिन सवाल पूछना गलत नहीं है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अधिकार है।
अगर EVM में गड़बड़ी हुई है—
सबूत दीजिए।
अगर वोट चोरी हुई है—
बूथ, नाम, रिकॉर्ड और evidence सामने रखिए।
अगर SIR में genuine voter का नाम गलत तरीके से हटाया गया है—
उसका data सामने रखिए।
और अगर कोई गंभीर institutional irregularity है—
Parliament में चर्चा कीजिए, उचित संसदीय प्रक्रिया अपनाइए, JPC की मांग कीजिए या न्यायालय का दरवाजा खटखटाइए।
यही लोकतांत्रिक रास्ता है।
और Supreme Court का फैसला भी याद रखिए
27 मई 2026 को Supreme Court ने Bihar SIR की validity को बरकरार रखा।
Court ने माना कि Election Commission को Article 324 और Representation of the People Act की Section 21(3) के तहत SIR कराने की शक्ति है।
लेकिन Court ने safeguards भी दिए—
excluded voters के कारण बताने, political parties के Booth Level Agents को सहायता करने और Aadhaar को identity document के रूप में स्वीकार करने जैसे निर्देश दिए।
साथ ही Court ने स्पष्ट किया कि Aadhaar citizenship का proof नहीं है।
यानी Supreme Court ने ECI की power को स्वीकार किया, लेकिन प्रक्रिया में safeguards की जरूरत भी बताई।
अब असली सवाल
संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है।
लेकिन—
सवाल और आरोप में फर्क होता है।
आरोप है—
तो evidence कहाँ है?
EVM hack हुई—
कहाँ हुई?
Vote Chori हुई—
किस बूथ पर हुई?
SIR में गलत deletion हुआ—
कितने genuine voters प्रभावित हुए?
Election Commission ने गलती की—
कौन सा नियम टूटा?
यही सवाल लोकतांत्रिक बहस को मजबूत बनाते हैं।
क्योंकि Election Commission किसी BJP की संस्था नहीं है।
कांग्रेस की भी नहीं।
किसी विपक्ष की भी नहीं।
यह भारत के चुनावों की संवैधानिक संस्था है।
Supreme Court किसी पार्टी की अदालत नहीं है।
सेना किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं है।
और लोकतंत्र सिर्फ तब तक लोकतंत्र नहीं है जब तक हमारी पसंद की पार्टी जीतती रहे।
लोकतंत्र तब भी मजबूत रहना चाहिए जब हमारी पसंद की पार्टी हार जाए।
इसलिए—
गलत voter भी नहीं होना चाहिए।
और genuine voter का अधिकार भी नहीं छिनना चाहिए।
सवाल जरूर पूछिए—
लेकिन सबूत के साथ।
क्योंकि लोकतंत्र संस्थाओं को कमजोर करने से नहीं—
उन्हें जवाबदेह, पारदर्शी और मजबूत बनाने से मजबूत होता है।
जय हिंद। 🇮🇳

