CJP: School सुधार या राजनीति?
बच्चों को राजनीतिक हथियार बनाना बंद हो!
CJP विवाद: स्कूल सुधार के नाम पर टकराव या बच्चों के हित की लड़ाई?बिहार में सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को लेकर सोशल मीडिया पर एक बार फिर बहस तेज है। CJP से जुड़े लोगों द्वारा स्कूलों की स्थिति, इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
स्कूलों की कमियां सामने लाना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है, लेकिन सवाल यह है कि कमियां उजागर करने का तरीका क्या होना चाहिए?अगर किसी स्कूल में भवन, शौचालय, पेयजल, फर्नीचर, पढ़ाई, भोजन या शिक्षकों से जुड़ी समस्या है, तो सरकार से जवाब मांगना चाहिए। संबंधित अधिकारियों को शिकायत दी जा सकती है, जांच की मांग की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता है।लेकिन यदि किसी शैक्षणिक परिसर में बड़ी संख्या में लोग बिना अनुमति पहुंचते हैं, वीडियो बनाते हैं और शिक्षकों या स्थानीय लोगों के साथ विवाद की स्थिति पैदा होती है, तो यह शिक्षा सुधार के उद्देश्य पर सवाल खड़े करता है।
विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन कानून और संस्थागत मर्यादा का पालन भी जरूरी है।जयपुर की घटना ने बढ़ाए सवालजयपुर में CJP टीम और ग्रामीणों के बीच कथित विवाद और झड़प की चर्चा भी सोशल मीडिया पर हुई। अलग-अलग पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। इसलिए पूरी घटना की स्वतंत्र पुष्टि के बिना किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।लेकिन एक बात स्पष्ट है—अगर किसी टीम के साथ मारपीट हुई है तो वह भी गलत है और यदि किसी समूह ने बिना अनुमति किसी परिसर में प्रवेश कर विवाद पैदा किया है, तो उसकी भी जांच होनी चाहिए।कानून सबके लिए समान होना चाहिए।सरकारी स्कूलों की कमियां छिपाई नहीं जानी चाहिएबिहार के सरकारी स्कूलों में समस्याएं हैं और उन्हें स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

कहीं भवन की स्थिति बेहतर करने की जरूरत है, कहीं शिक्षकों की कमी है, कहीं पढ़ाई की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत है और कहीं सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती हैं।जहां समस्या है, वहां सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए।अगर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण भोजन नहीं मिल रहा है, जांच होनी चाहिए। अगर किसी योजना में भ्रष्टाचार है, कार्रवाई होनी चाहिए। अगर स्कूल भवन के लिए पैसा खर्च होने के बावजूद काम नहीं हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।लेकिन एक समस्या को आधार बनाकर पूरी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को असफल बताना भी सही तस्वीर नहीं है।
2014 के बाद शिक्षा में हुए बदलावों पर भी चर्चा होसरकार की आलोचना करने के साथ यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि पिछले वर्षों में सरकारी स्कूलों में क्या बदलाव हुए हैं।बिहार में मॉडल स्कूलों की पहल की गई है। 155 मॉडल स्कूलों में बेहतर शैक्षणिक वातावरण, आधुनिक सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में काम किया जा रहा है।
JEE और NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए निःशुल्क कोचिंग जैसी पहल भी महत्वपूर्ण है। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला गरीब परिवार का बच्चा अगर इंजीनियरिंग या मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर सकता है, तो यह शिक्षा व्यवस्था में एक सकारात्मक बदलाव है।इसके अलावा स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा और तकनीकी एवं कौशल आधारित पाठ्यक्रमों पर भी जोर दिया जा रहा है। आज के समय में बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि तकनीकी और रोजगारपरक कौशल भी चाहिए।
गरीब बच्चे के लिए शिक्षा सिर्फ किताब नहीं हैएक गरीब परिवार के बच्चे के लिए स्कूल जाना केवल पढ़ाई का सवाल नहीं है। उसके लिए भोजन, किताब, कॉपी, ड्रेस और आर्थिक सहायता भी महत्वपूर्ण है।सरकारी योजनाओं के माध्यम से बच्चों को मिड-डे मील, पोशाक, किताब-कॉपी और छात्र प्रोत्साहन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।उच्च शिक्षा के लिए Student Credit Card जैसी योजनाएं भी विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चलाई जा रही हैं।इन योजनाओं की सफलता, कमियां और जमीन पर इनके क्रियान्वयन की निष्पक्ष समीक्षा जरूर होनी चाहिए।
लेकिन सकारात्मक प्रयासों को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है।आलोचना हो, लेकिन तथ्यों के साथआज सोशल मीडिया के दौर में किसी स्कूल का एक वीडियो कुछ ही घंटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।किसी शिक्षक पर आरोप है तो जांच होनी चाहिए। किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप है तो दस्तावेज और जांच सामने आनी चाहिए। किसी स्कूल में अनियमितता है तो कार्रवाई की मांग होनी चाहिए।लेकिन आरोप और प्रमाण को एक ही चीज मान लेना लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है।CJP या कोई भी संगठन अगर वास्तव में बच्चों के हित में काम कर रहा है, तो उसे अपनी शिकायतें तथ्य, दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया के साथ सरकार के सामने रखनी चाहिए।
सरकार को भी ऐसी शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहिए और जहां कमी मिले, वहां तुरंत सुधार करना चाहिए।सरकार को भी आत्ममंथन करना होगाइस पूरे विवाद में जिम्मेदारी केवल सामाजिक संगठनों की नहीं है। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति की लगातार निगरानी करे।जहां इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है, वहां काम हो।जहां शिक्षक की कमी है, वहां नियुक्ति या उचित व्यवस्था हो।जहां योजनाओं में गड़बड़ी है, वहां जांच हो।और जहां अधिकारी लापरवाही कर रहे हैं, वहां जवाबदेही तय हो।क्योंकि जनता को सिर्फ दावे नहीं, जमीन पर परिणाम चाहिए।बच्चों के भविष्य को विवाद का मैदान न बनाएंसरकारी स्कूल किसी राजनीतिक दल का कार्यालय नहीं हैं।
वे बच्चों का भविष्य बनाने की जगह हैं।इसलिए वहां जाने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, शिक्षकों की गरिमा बनी रहे और कानून का पालन हो।सरकार से सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सरकार द्वारा किए जा रहे कामों की जानकारी जनता तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।स्कूल सुधारना है तो संवाद बढ़ाइए, टकराव नहीं।कमियां दिखाइए, लेकिन समाधान भी बताइए।आरोप लगाइए तो प्रमाण दीजिए।बिहार के बच्चों को राजनीतिक विवाद नहीं चाहिए। उन्हें बेहतर स्कूल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और उज्ज्वल भविष्य चाहिए।आखिरकार असली मुद्दा यही होना चाहिए—कौन स्कूल को बेहतर बना रहा है और कौन सिर्फ उसे विवाद का विषय बना रहा है?
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